Alfred Bernhard Nobel Biography in Hindi

ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल : मौत के सौदागर से शांति दूत तक

Alfred Bernhard Nobel Biography in Hindi
Alfred Nobel (Pic Source: hi.wikipedia.org)

Alfred Bernhard Nobel (ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेलकी)

ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल की याद में उनके द्वारा स्थापित ट्रस्ट द्वारा विश्व प्रसिद्ध नोबेल पुरुस्कार दिया जाता है ऐल्फ्रेड नोबेल को “मौत का सौदागर” कहा जाता था और हर कोई उनसे नफरत करता था पर ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) के साथ हुई एक घटना ने उन्हें अपने पूरी छवि को बदले का मौका दिया और आज उनके नाम से विश्व का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान दिया जाता है।

ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) का जन्म 21 अक्टूबर सन 1833 में स्वीडन के स्टॉकहोम शहर में हुआ था। उनकी माँ का नाम कैरोलिन और पिता का नाम इमानुएल नोबेल था.

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इमानुएल नोबेल एक अविष्कारक थे पर अशिक्षित होने की वजह से वो पहाड़ों से पत्थरों को तोड़ कर पुल बनाने का काम किया करते थे कुछ समय बाद स्वीडन में काम की कमी होने के कारण ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) के पिता 1842 में पुरे परिवार के साथ रूस के एक शहर सेंट पीटर्सबर्ग चले गए यंहा वे रूस सरकार के लिए खेती के औज़ार के अल्वा अग्न्यास्त्र ,सुरंगे का निर्माण किया करते थे बाद में इमानुएल नोबेल ने  गन पावडर बनाने की फैक्टरी डाल ली।

इमानुएल नोबेल के बनाये गए गन पावडर का इस्तेमाल रूस की सेना युद्ध में किया करती थी गन पावडर मनुष्य द्वारा बनाया गया पहला विस्फोटक है।

फैक्टरी खोलेने के कुछ समय बाद ही क्रीमियन युद्ध शुरू हो गया जिसके कारण गन पावडर की मांग बहोत बढ़ गई जिसे इमानुएल नोबेल का काम बहोत बढ़ गया और उन्होंने काफी पैसे भी कमाए।

इमानुएल नोबेल ने ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) की पढाई के लिए घर पर ही टूशन क्लासेस प्रारम्भ करा दिए जिसके कारण ऐल्फ्रेड नोबेल को 17 साल की छोटी सी उम्र में ही इंग्लिश, फ्रेंच, जर्मन भाषा की अच्छी जानकारी हो गई थी साथ ही साथ रसायन-शास्त्र में भी उन्होंने अच्छी पकड़ बना ली थी।

ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) को सन 1850 में और अच्छी पढाई के लिए USA (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका) भेजा गया। जंहा से वो अपनी पढाई पूरी कर के पैरिस चले गए।

पैरिस में वो असकानियो सूबडेरियो से मिले जिन्होंने तीन साल पहले नाइट्रोग्लिसरिन का अविष्कार किया था। नाइट्रोग्लिसरिन एक ऐसा केमिकल था जो गन पावडर और किसी भी अन्य विस्फोटक से ज्यादा शक्तिशाली था पर नाइट्रोग्लिसरिन में एक बहोत बड़ी कमी थी वो सुरक्षित नहीं था उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना खतरनाक था क्यूंकि नाइट्रोग्लिसरिन कभी भी ब्लास्ट हो जाता था इसलिए उसका उपयोग नहीं के बराबर होता था।

इस दौरान क्रीमियन का युद्ध भी ख़त्म हो चूका था और ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) के पिता को रूस से फैक्ट्री बंद करके स्वीडन वापस आना पड़ा। ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) भी नाइट्रोग्लिसरिन का नमूना लेकर अपने घर स्वीडन वापस आ गये।

रूस से स्वीडन वापस आने के बाद वे अपने पिता और भाई के साथ मिलकर अपने प्रयोगशाला में नाइट्रोग्लिसरिन को सुरक्षित बनाने पर अध्ययन करने लगे ।

3 सितम्बर 1864 को उनके प्रयोगशाला में नाइट्रोग्लिसरिन के कारण एक जबरदस्त धमाका हुआ जिसके कारण उनका पूरा प्रयोगशाला बर्बाद हो गया और इस धमाके में ऐल्फ्रेड नोबेल के छोटे भाई की भी मौत होगी। इस हादसे के बाद ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) के पिता ने ये काम छोड़ दिया। और स्वीडन की सरकार ने भी शहर के अंदर इस तरह के प्रयोगशाला खोलने पर रोक लगा दिया।

ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) ने शहर के बाहर एक नया प्रयोगशाला बनवाया और अपने काम को जारी रखा कुछ सालों की मेहनत के बाद उन्हें सफलता मिल गई। उन्होंने खोजा की यदि नाइट्रोग्लिसरिन में सिलका मिलाया जाए तो नाइट्रोग्लिसरिन का एक पेस्ट बन जाता है जिसे कोई भी आकार दिया जा सकता है और इस स्थिति में नाइट्रोग्लिसरिन को कंही भी ले जाया जा सकता है। इस खोज का पेटेंट ऐल्फ्रेड नोबेल ने डायनामाइट (dynamite) नाम से कराया ।

इस डायनामाइट की मांग पूरी दुनिया में होने लगी ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) ने अपनी डायनामाइट बनाने की कंपनी 20 से ज्यादा देशो में खोली। डायनामाइट के प्रयोग से पहाड़ों को तोड़ के रास्ते का निर्माण करना आसान हो गया था साथ ही पहाड़ो से कोयला को बहार निकालना भी आसान हो गया था।

लेकिन इस डायनामाइट का प्रयोग युद्ध में ज्यादा होने लगा डायनामाइट के इस्तेमाल से युद्ध में बहोत से लोगो की जान चली गई। जिसका पूरा आरोप डायनामाइट के जनक ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) पर लगाया गया और लोग उन्हें मौत का सौदागर और मौत का व्यापारी कह कर बुलाने लगे।

एक दिन नोबेल उपनाम से ही किसी व्यक्ति की मौत दुर्घटना में हो गई थी जिसे गलती से ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) मान लिया गया और अख़बार में “मौत के सौदागर की दुर्घटना में मौत” शीर्षक से खबर छपी ये खबर ऐल्फ्रेड नोबेल ने पढ़ी इसके शीर्षक को पढ़ कर उन्हें बहोत दुःख हुआ उन्होंने ये खोज लोगो के भलाई के लिए किया था और लोग उन्हें आज मौत का सौदागर कहते है वो कभी भी बदनाम हो कर नहीं मरना चाहते थे।

इस घटना के बाद उन्होंने लोगो की मदद करना शुरू कर दिया अपना एक ट्रस्ट “The Nobel Foundation” बनया जिसमे अपनी सारी दौलत दे दी और मरने से पहले अपनी सम्पति एक पुरुस्कार के रूप में उन लोगो को दान कर दी जो दुनिया की प्रगति और शांति के लिए सबसे अच्छा काम करेंगे।

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Alfred Bernhard Nobel Founder of Nobel Prize

Pic Source: famousscientists.org

दिसम्बर 1896 को ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) की मृत्यु हो गई लेकिन आज भी हर साल 10 दिसम्बर को विश्व का सबसे बड़ा पुरुस्कार नोबेल पुरुस्कार दिया जाता है आज उन्हें मौत के सौदागर के रूप में नहीं बल्कि एक बहोत बड़े वैज्ञानिक और समाज सेवक के रूप में याद किया जाता है.

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note :- ये आर्टिकल इंटरनेट पर मौजूद तथ्यों पर है लेखक इसकी सत्यता का पूरी तरह दावा नहीं करता है।

 

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